स्वाइन फ्लू का इलाज आयुर्वेद में.

स्वाइन फ्लू से बचाव और इलाज के लिए आयुर्वेद और होम्योपैथी सरीखी चिकित्सा पद्घतियों में इलाज खोजे जाने के दावे किए गए हैं। इन चिकित्सा पद्घतियों में सक्रिय विशेषज्ञों का मानना है कि जनसाधारण अपने शरीर में रोग प्रतिरोधात्मक बल को मजबूत कर स्वाइन फ्लू के वायरस को मात दे सकता है। आयुर्वेद के विशेषज्ञ इस रोग के लक्षणों को आयुर्वेद की प्राचीन संहिताओं में वर्णित वात श्लेष्मिक ज्वर लक्षणों के निकट मानते हुए उसे स्वाइन फ्लू के बराबर का रोग बता रहे हैं। राष्ट्रीय आयुर्वेद महाविद्यालय ने गोलियों, सिरप और काढ़े के रूप में औषधियां बनाकर अपने ओपीडी के रोगियों को देनी शुरू भी कर दी हैं।

रिसर्च करने के बाद लावण्य आयुर्वेदिक हास्पिटल के चेयरमैन अशोक श्रीवास्तव ने एनबीटी से बातचीत में कहा कि शास्त्रों में जिस स्वाइन फ्लू सरीखे रोग का जिक्र है, उसके लक्षणों में - शरीर में भारीपन, शिरा शूल, सर्दी जुकाम, खांसी, बुखार और संधियों में पीड़ा होना है। तीव्रावस्था में यह अवस्था शीघ्रकारी और प्राणघातक सिद्घ हो सकती है। इस अवस्था विशेष को 'मकरी' नाम से जाना जाता है। अशोक श्रीवास्तव का दावा है कि ये लक्षण असल में स्वाइन फ्लू के लिए विशिष्ट न होकर वायरस से होने वाले बुखारों के लिए सामान्य लक्षण हैं। स्वाइन फ्लू का बचाव एवं उपचार आयुर्वेद की सहायता से किया जा सकता है।

इसके लिए शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने वाली औषधियां - गुड़ची, काली तुलसी, सुगंधा आदि का प्रयोग करना चाहिए। रोग के विशिष्ट उपचार के लिए पंचकोल कषाय, निम्बादि चूर्ण, संजीवनी वटी, त्रिभुवन कीर्ति रस, गोदंति भस्म और गोजिहृदत्वात् औषधियां प्रयोग की जाती हैं, लेकिन इनका प्रयोग रोग की अवस्था के अनुसार आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में ही किया जाना चाहिए। स्वाइन फ्लू के एलोपैथी इलाज के बारे में अशोक श्रीवास्तव का मानना है कि आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद की चिकित्सा पद्घतियों के तालमेल से स्वाइन फ्लू का मजबूती से सामना किया जा सकता है।

होम्योपैथी डॉक्टर पंकज भटनागर के अनुसार स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए जेल्सिमिनम 30 की दस-दस गोलियां दिन में तीन बार लेनी चाहिए। रोग के उपचार के लिए उनका कहना है कि एकोनाइट 30, बेलेडोना 30, आरसेनिक अल्बम 30, रूसटॉक्स 30, नक्सवोमिका 30 और इन्फ्लुऐंजीनम 30 उपयोगी सिद्घ होती हैं। पर ये दवाएं रोग के लक्षण के अनुसार ही लेनी चाहिए। जैसे जल्दी जल्दी प्यास लगे, गला सूखे और सांस लेने में तकलीफ हो तो आरसेनिक अल्बम 30 उपयोगी सिद्घ होगी लेकिन यदि तीव्र ज्वर हो तो एकोनाइट 30 लेनी होगी। गले में तकलीफ हो तो बेलेडोना लाभदायक होगी और यदि तेजी से नाक बहती हो तो इन्फ्लुएंजीनम 30 लेनी चाहिए। इसके साथ ही डॉ। भटनागर की सलाह है कि कोई भी दवा और उसकी मात्रा बगैर चिकित्सक की देखरेख के नहीं लेनी चाहिए।

जबकी आयुर्वेद के डाक्टर रुपेश श्रीवास्तव घरों में आम काम में आनेवाली कपूर को इसके रोधी के रूप में पर्याप्त मानते हैं।

3 comments:

आलोक said...

खुशी की बात है।

Kusum Thakur said...

जानकारी के लिए आभार.

दिल दुखता है... said...

ayurved mein to sab ka ilaaj hai bas jarurat hai khojne ki..................

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