लो क सं घ र्ष !: वंशी की मधुरिम तानें...


वंशी की मधुरिम तानें
है कौन छेड़ता मन में ?
कुछ स्नेह-सुधा बरसता
है कौन व्यष्टि के मन में ?

रे कौन चमक जाता है,
निर्भय सूखे सावन में।
सागर का खारा पानी ,
अमृत बन जाता घन में॥

किसमें ऐसी गति है जो,
सबमें गतिमयता भरता।
मानव-मानस दर्पण में,
है कौन अल्च्छित रहता ॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल "राही"

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