सोनल रस्तोगी को आपत्ति है शायद कि शोएब को बहनचो** क्यों लिखा आएशा ने....

सोनल बहन जी कोई कमीना, नीच, वासना का भूखा इंसान नुमा दिखने वाला दरिंदा और तो और धर्म की आड़ में स्त्री की देह को रौंद कर उसे गर्भवती कर देता है औरफिर उस स्त्री को दुर्दैववश गर्भपात हो जाता है ऐसे में वो पति कहलाने वाला गलीज़ आदमी दूसरी औरत पर लार टपका रहा है और पहली पत्नी को दुनिया के सामने चीख चीख कर बड़ी बहन(आपा) बता रहा है । इसके बाद वही आदमी निकाह को होने को स्वीकारता है पंद्रह हज़ार रुपये कीमत देने की बात होती है उस बेचारी की देह रौंदे जाने की फिर तलाक की धार्मिक जायज नाजायज की कबड्डी खेली जाती है और दूसरी लड़की से शादी कर ली जाती है फ़िर जब मन भर जाएगा इस दूसरी से तो तीसरी से शादी कर ली जाएगी इसे बहन बता कर।
अब ऐसे में अगर आएशा बहन ने इस दरिंदे को बहनचो** लिख दिया तो आप भाषा पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगीं। आप तो आक्रोश का समर्थन कर रही हैं लेकिन निःशब्द क्यों हैं खामोशी इस बात के लिये कि कहीं आँख में आँसू लाकर चीख कर गाली देने से बौद्धिक लोगों की कतार से बेदखल न कर दी जाएं? क्या जरा सी भी लज्जा है इस चुप्पी पर या लज्जा का समीकरण भी निःशब्द ही है। भड़ास पर स्त्रियों को देख कर कई बार लोग हिकारत से देखते हैं लेकिन सच तो ये है कि यही वह मंच है जहाँ हम अन्याय के विरोध में मुट्ठियाँ भींच कर जी भर कर गालियाँ दे लेते हैं अपने आक्रांता को जिसे हम लतिया-जुतिया नहीं सकते। आप वो शब्दकोश ले आइये जिसमें इस तरह के आक्रोश को व्यक्त करने के लिये बिल्कुल सही शब्द हों लेकिन आपकी भाषा में सभ्यता के दायरे में आते हों ताकि हम गंवार भड़ासिन बहनें खुद को रौंदे जाने पर आपकी तरह निःशब्द न रह जाएं। आपको साधुवाद पहुंचे।
जय जय भड़ास

No comments:

Post a Comment