देखिये मात्र कुछ महीनों पहले ये "हक़ीर" हुआ करती थीं
चमत्कार हो गया हरकीरत "हक़ीर" कब से "हीर" बन गयी हैं हमें पता ही न चला कि कल तक जो हक़ीर हुआ करती थीं आज वे किसी रांझे की हीर बन चुकी हैं। ये ब्लागिंग भी कमाल की चीज है मुझ ज़ैनब को लैला बना दे क्या भरोसा या बड़े भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव को रोमियो बना दे क्या ऐसी भी तासीर है इसमें?? इतने दिनों से कुछ लिख न पायी थी आज मन करा कि पुराना कबाड़ टटोलूं क्योंकि मुंबई की हालिया ब्लागर मीट में मैं भी न जा सकी थी, शहर से बाहर थी। हरकीरत जी को मुबारक हो ये रूमानी बदलाव लेकिन पता नहीं क्यों बड़े भाई डा.साहब पर दया आ रही है कि जब इन जैसी दर्द दर्द चिल्लाने वाली किसी की हीर बन सकती है तो आप इतने समय से लोगों के दुःख दर्द बांट रहे हो, इसी रास्ते चुपके से मजनूं, रोमियो जैसे कुछ क्यों न बन पाए?जय जय भड़ास

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