दोहे और उक्तियाँ !!

बंजारानामा



क्यों जी पर बोझ उठाता है इन गौनों भारी-भारी के

जब मौत का डेरा आन पड़ा फिर दूने हैं ब्योपारी के

क्या साज़ जड़ाऊ, ज़र ज़ेवर क्या गोटे थान किनारी के

क्या घोड़े ज़ीन सुनहरी के, क्या हाथी लाल अंबारी के

सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा



मग़रूर न हो तलवारों पर मत भूल भरोसे ढालों के

सब पत्ता तोड़ के भागेंगे मुंह देख अजल के भालों के

क्या डिब्बे मोती हीरों के क्या ढेर ख़जाने मालों के

क्या बुक़चे ताश, मुशज्जर के क्या तख़ते शाल दुशालों के

सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा



('नज़ीर' अकबराबादी)



2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

नव वर्ष की मंगल कामनाएँ!

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

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