भड़ास और अनेक समाचार पत्रों में सर्वोदय समाज के अशोक कुमार सिंह द्वारा महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे को २५ दिसम्बर के रोज जान से मार देने वाले धमकी भरे पत्र की चर्चा देखी। विचार करने पर कोई मूर्ख भी इस नतीजे पर आ सकता है कि यदि अपने घर में खाना मिले तो कोई क्यों बाहर कमाने जाएगा। मैं बिहार का रहने वाला हूं और इस बात को भली प्रकार से जानता हूं कि खेती से लेकर खनिज तक की बड़ी सम्पदा होने के बावजूद इस राज्य के नेताओं ने क्षेत्र को एकदम जंगल जैसा, दीनहीन, दरिद्र और अराजकता से भरा बना कर रखा है। यू.पी. और बिहार जैसे सम्पन्न राज्यों को चूस कर वहां के नेताओं ने हजारों करोड़ रुपए स्विस बैंको के अपने खातों में जमा कर रखे हैं अगर ये कमीने चाहते तो राज्य का इतना विकास कर सकते थे कि कुदरती तौर पर संसाधनों से सजे हुए इन प्रदेशों को रोजगार की प्रचुरता से भर सकते थे लेकिन इन हरामियों ने हमारे प्रदेशों को दरिद्र और अराजक बना कर रखा।
मैं राज ठाकरे की सोच से पूरी सहमति तो नहीं रखता लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि यदि हम इतने वर्षों तक किसी से उसकी रोटी-रोजगार बांटते रहे और वो कुछ न बोले तो अच्छा है लेकिन अगर वो अपने हक की बात करे तो गुंड़ा और बदमाश कहलाने लगता है। मैं सर्वोदय समाज के दुर्बुद्धि चूतियों को ललकार रहा हूं कि अगर दम है तो जिन्होंने यू.पी., बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को चूस लिया है उनमें से एक भी नेता को मार कर दिखाएं। मधु कोड़ा क्या इन कुबुद्धि क्रान्तिकारी बने चूतियों का बाप है जो इनकी इतनी बुरी तरह बजा चुका है लेकिन वो इन्हें मंजूर है। कोई हिंदी का विरोध कर दे तो उसे जान से मार देंगे और कोई जमाने से प्रदेश की जनता की अस्मिता के साथ लगातार सामूहिक बलात्कार कर रहा है तो उसे कुछ न बोलेंगे। मैं अशोक कुमार सिंह से कहता हूं कि क्या अपने रोजगार और संसाधनों को बांटने की हिम्मत है? मैं दाद देता हूं महाराष्ट्र के लोगों का जिन्होंने इतने समय तक सहिष्णुता से बाहरी लोगों से अपनी रोटी-रोजगार को बांटा है।
जय जय भड़ास
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