आजकल वापस अपने कलम से मानो देश का कलम सिपाही या फ़िर बाजारवाद में अपने धंदे के लिए दलाली और दलाली न दे तो कलम से उसकी बजा दी। मीडिया की ये ही पहचान ने आम लोगों में मीडिया की विश्वसनीयता कम की और इसके लिए प्रभाष जोशी गुर्गों की जमात ने इसमें सबसे अग्रणी भूमिका निभाई।
जरा एक नजर इस तस्वीर पर देखिये.........
जी हाँ आज कल अलोक तोमर ने सच बोलने का ठेका ले रखा है, और अपने वेब साईट पर इस सच को जो की सच से ज्यादा उस लेखक की खीझ लगती है जिसका कलम कुंद हो चुका है और जो अपने कलम को बेचने के लिए मारा मारा फ़िर रहा हो मगर खरीदार नही मिलता है।
कभी आलोक तोमर को रजत शर्मा सबसे बार फ्राड और दलाल लगता है तो कभी टी वी के टी आर पी ठगी का धंधा लेकिन इन सबमें जो एक बात निकल कर आती है की आख़िर अलोक तोमर को इनपर खीझ क्यूँ आती है। इस धंदे के पुराने शातिर खिलाड़ी तो आप ही रहे हो महाराज। लिब्राहन आयोग पर मनमोहन को निशाना बनाना और फोटो युवराज सिंह की बातें हित की मगर किसकी।
पत्रकारिता के वो लोग जो अलोक तोमर से मीलों आगे निकल गए जबकि वो छोटे छोटे दलाल थे जब तोमर जी इनमे ख़ास स्थान रखते थे तो खीझ प्रभु चावला पर भी उतरेगी ही लेकिन इन सबसे जो सिर्फ़ एक बात सामने आती है वो ये की प्रभाष जोशी के जितने भी गुर्गे रहे सभी के सभी प्रभाष जी की तरह महत्वाकांक्षी और महत्वाकांक्षा पुरा ना हुआ तो वापस अपने पुराने धंधे पर.....
जय हो
जय जय भड़ास
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