क्या बीटी बैंगन को व्यापारिक उपयोग के लिए स्वीकृति मिल पाएगी ?

BT Brijalअमेरिका में जेनेटिकली मोडिफाइड तरीके से बनाए गए 'बीटी बैगन' की गूंज आजकल सत्ता के गलियारों से लेकर खेतों तक खूब सुनाई दे रही है। दरअसल कृषि क्षेत्र में बढती संभावनाओं और व्यापर के उभरते आयाम को देखते हुए अमेरिका अब इसे भारत को बेचने की तैयारी कर रहा है। अमेरिका से आए एक प्रतिनिधि मंडल ने पिछले दिनों दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में भी इसके लिए पैरवी की थी। इस पैरवी की वजह भारतीय बाज़ार में 'बीटी-बैगन' के लिए रास्ता साफ़ करना माना जा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक भारत की जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) ने बीटी बैगन के उपयोग को हरी झंडी दिखा दी है पर सरकार से अब भी इसके व्यापारिक उपयोग के लिए स्वीकृति मिलना बाकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विदेशी बैगन के उपयोग से भारत के किसानो को फ़ायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा।

गौरतलब है कि संसद के शीतकालीन सत्र में बार इस बार दो महत्वपूर्ण मुद्दों, सीड बिल और नेशनल बायोटेक्‍नोलॉजी रेगुलेटरी ऑथोरिटी बिल पर चर्चा होनी है। यही वजह है कि अमेरिका से आए प्रतिनिधि मंडल ने विपक्ष से लेकर सत्तापक्ष में बैठे मंत्रियों तक को मनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

उधर, अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के उस बयान ने भी भारतीय विशेषज्ञों को खासा नाराज़ कर दिया है, जिसमें उन्होंने सख्त पेटेंट राइट्स के बारे में बात की है। माना जा रहा है इस समझौते के अंतर्गत किसी अन्य देश को बीटी बैगन के बीज बेचने और बनाने की इजाज़त नहीं होगी।

क्या है बीटी बैगन: बीटी बैगन का वैज्ञानिक नाम बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस (Bacillus thuringiensis)। यह मिट्टी में पाया जाने वाला बैक्‍टीरिया है जिसके जीन को मोंसैंटो के जीएम मक्‍का मोन-810 में मिलाया जाता है। गौरतलब है कि इसकी खेती जर्मनी में प्रतिबंधित कर दी गई है। हालांकि 'बीटी बैगन' जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी की स्‍वीकृति पाने के काफी करीब पहुंच चुकी है और उम्‍मीद है कि इस वर्ष के अंत तक वाणिज्यिक उत्‍पादन के लिए इसके बीज बाजार में आ जाएंगे।

क्या हो सकते हैं नतीजे: बैसिलस थ्‍युरिंगियेंसिस बैक्‍टीरिया का जीन मक्‍के में एक जहरीला प्रोटीन पैदा करता है, जिससे उनको नुकसान पहुंचाने वाली कॉर्नबोरर तितली का लार्वा मर जाता है। बीटी बैगन में इस जीन के मिलावट के पीछे भी पौधे में नुकसानदेह कीटों को मारने की क्षमता विकसित करने की ही सोच है। संभव है इस जीन प्रोद्यौगिकी की मदद से कीटनाशकों पर होनेवाला किसानों का व्‍यय बचे तथा उपज में वृद्धि हो। लेकिन मानव स्‍वास्‍थ्‍य व पर्यावरण पर इसका कितना दुष्‍प्रभाव पड़ेगा, इसका समूचा आकलन अभी शेष है।



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