मेरी पहली पोस्ट.....

ये इस चिट्ठे पर मेरी पहली पोस्ट है, और खुशी इस बात की है की आज भड़ास में भी एक नयी भडास निकल कर सामने आयी है, वैसे भी क्या फर्क पड़ता है , ये तो तय है की जितना बकवास मैं अपने अन्य ब्लॉग पर लिखता हूँ चाहकर भी उससे अलग इस पर थोड़े ही लिखूंगा, अजी आदत जो हो गयी है , खैर गोली मारिये मेरी आदतों को...

दरअसल आज समस्या ये है की, मेरे छोटे से पुत्र ने जिसने की आजकल पिक्चर देखने का शौक बना लिया है, आते ही मुझे हीरो बनने पर तुल जाता है, कभी सिंग बनाता है तो कभी किंग। मैं उसे अफ़सोस के साथ कहता हूँ की अबे हीरो तो मुझे तू बना देता है मेरी हीरोइन के बारे में कुछ सोचता करता नहीं है, उसका जवाब होता है पापा वो मेरी टेंसन नहीं है। मैं तो सिर्फ़ ये चाहता हूँ की आप हीरो की तरह लगें। मैने शुक्र मनाया की उसने दोस्ताना नहीं देखी....
मगर गजनी देख ली , अजी देख क्या ली, गौर से देख ली, और आमिर के सारे प्लेट्स, पट्टियां, और शौकर गिन कर आ गया, आपने आदत के मुताबिक मुझे gajnई बनाने पर तुल भी गया।
अब ये तो मेरी शराफत और पुत्र मोह ही था की बाल कटाने से लेकर , सर पर बाई पास बनवाने से लेकर अंतडियां दिखाने के तक के सारे काम मैंने कर लिए, बीवी को आसिम भी मान लिया, अलबता परेशानी तो ये हो गयी है की अब मुझे वो दुश्मन नहीं मिल रहा जो मेरी हीरोइन , यानि श्रीमती जी को मार सके, अजी मार क्या, टक्कर भी मार sake और मेरा गजनी बन सके।
अब इस बौडी को लिए घूम रहा हूँ, जब तक पुत्र अगली पिक्चर न देख ले, वैसे चांदनी चौक तू चाईना, का रिस्क मैंने नहीं लिया है, वरना चीन की दीवारों पर न दौड़ना पड़े.

3 comments:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

अजय भाई अच्छा हुआ कि हमारे भतीजे ने अब तक जम्बो नहीं देखी वरना आपको हाथी बना कर ही दम लेता....
बालक भड़ासी को हम सबका आशीर्वाद दीजिये।
जय जय भड़ास

अजय कुमार झा said...

aapka bahut bahut dhanyavaad, padhne aur ye batane ke liye ki main hathee banne se bach gaya.

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

अजय भाई, नीक लागल.
आहाँ शुरू भय गेलहुं तय आब बंद नही करू.
अपनी लेखनी और विचार को भड़ास के लिए नया आयाम बनते रहिये.
शुभकामना.
जय जय भड़ास

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