न्याय के सिपाही को ख़बर बनाने से ब्लॉग का भी इनकार.

भड़ास ने छपी पोस्ट को डिलीट किया।

देश का सिपाही, कानून का ज्ञाता और पूर्व में जज रह चुके जस्टिस आनंद सिंह की इन्साफ और न्याय की लड़ाई में मीडिया ने कभी रूचि नही दिखाई ये बात दीगर नही है परन्तु अब मीडिया के साथ कदम ताल करते मीडिया के पैरोकार बने ब्लॉग समुदाय के सदस्यों ने भी व्यवसायिकता की होड़ में ख़बर के मुकाबले व्यवसाय, मुद्दे के मुकाबले सनसनी, सरोकार के मुकाबले भावना को बेचने की होड़ में शरीक होती जा रही है

जब टी वी पत्रकारिता पर सरकार के सेंसर लगाने की बात आई तो बाजारवाद में घुर विरोधी बने ये चैनल के कर्ता धर्ता पत्रकारिता की दुहाई के साथ सरकार के साथ विपक्ष और अन्य समुदाय के साथ लड़ाई पर उतारू हो आई। सेंसर की ख़बरों पर नजर रखे हुए मैं जब इसकी छानबीन करने के लिए इन्टरनेट के माध्यम से तकरीबन सौ से ज्यादा टी वी, अखबार और जन संपर्क से जुड़े हुए चौबीस से तीस साल के लोगों से बातचीत किया जिनमे आई बी 7, आज तक, इंडिया टी वी, इंडिया न्यूज़ स्टार और जी न्यूज़ के अलावे न्यूज़ 24 और कई पी आर कंपनियों में कार्यरत लोगों ने भी अपने विचार रखे और सभी का एक स्वर में कहना कि " हमने प्रबंधन की पढाई नही की है, सामजिक सरोकार और लोगों के लिए संवाद के माध्यम से कुछ कर गुजरने की ललक ने पत्रकारिता का रुख करवायामगर संस्थान में आने के बाद पता चला कि हमें पत्रकारिता नही बल्की बाबूगिरी करनी है जिससे हमारे संस्थानों के पाठक और दर्शक में बढोत्तरी हो सकेअगर ये पत्रकारिता है तो नि:संदेह सरकार को सेंसर लगाना चाहिए"


मीडिया तो मीडिया ब्लॉग ने भी साथ छोड़ा

बीते दिनों पंखे वाली भड़ास से हमारी सदस्यता समाप्त कर दी गयी, मगर पता ना होने की वजह से तत्क्षण ही मेरा पोस्ट भी उसके ठीक ऊपर आया जो न्याय और इन्साफ के लिए सरकार और कानून से देश की लड़ाई लड़ रहा हमारा सिपाही जस्टिस आनंद सिंह से जुडा हुआ था। टी वी पत्रकारिता और अखबार के बाद अब ख़बरों के पैरोकार ने भी आनंद सिंह को ख़बर बनाने से इनकार कर दिया, ये ही तो बाजारवाद है। जो बिकता है वो चलता है आम लोगों की भावनाओं का रोज ही बलात्कार हो किसे फिकर है।

ये वो ही आनंद सिंह हैं जो कभी जज हुआ करते थे और कानून के नुमाइंदे ने ही व्यक्तिगत रंजिश के कारण इन पर देशद्रोह का मुकदमा चला कर उसमें पाँच साल के लिए इनको सपरिवार सलाखों की पीछे भेज दिया, पत्रकारिता के पैरोकार के लिए कोई ख़बर नही थी। आनंद सिंह ने बा-इज्जत बड़ी होकर अपने मान सम्मान के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जो वस्तुतः: आम लोगों से जुडा हुआ था जो की मीडिया के इन पैरोकार के लिए कोई ख़बर नही थी। इन्साफ के मन्दिर में जज को साजिश कर अंदर जाने नही दिया गया और इनको गैरहाजिर बता कर याचिका खारिज कर दिया गया और पत्रकारिता के लिए ये कोई ख़बर नही थी।

संजय दत्त और मान्यता की शादी, बे शादी, चुनाव सरीखे पर पुरे दिन लोगों का जीना हराम करने वाले के लिए ये पत्रकारिता है, बिहार में बाढ़ के पानी को पहले दिखाना मगर उसके बाद भीषण तबाही, भुखमरी, बिमारी, और शासन कोई ख़बर नही ये हमारी पत्रकारिता है।

निश्चय ही जो बिकाऊ है उस पर सरकार का नियंत्रण होना ही चाहिए। अगर पत्रकारिता आम जन की आवाज है तो इस पर प्रतिबन्ध का लोग भी विरोध करें मगर अगर बाजार की बोल चाल में एक व्यवसाय तो सरकार का नकेल जरुरी हो जाता है। आज के पत्रकारों को वरिष्ट पत्रकार खुशवंत सिंह के शब्दों में कुछ इस तरह से परिभाषित किया गया है कि Journalisam is Food, Film, Fashion and Fuck the Editor. अब पत्रकार ख़ुद निर्धारित कर लें कि क्या वो इस स्वतन्त्रता के हक़दार हैं ?

2 comments:

intonothing said...

bahut accha rajnish bhai. accha laga aapka point of view. aur aapki krantikari vichardhara se mein impress hua. jab aap jaisa dost unke saath hai to unhe koi nahi hara sakta. bas lage rahiye. waise to mein kisi kaabil nahi lekin phir bhi meri kisi prakaar ki madad ki aawashyakta ho to mein haazir hoon. dhanyawad
vivek choudhary
guru927@gmail.com

रंजनी कुमार झा (Ranjani Kumar Jha) said...

तीखा और चुभाऊ लेख है, यशवंत के भड़ास पर मैंने देखा है की किस तरह से ख़बरों को बेचने के लिए पोस्ट में हेरा फेरी की जाती है, अपने साईट के लिए वह इसे हटाता ही ये तय था.
यशवंत की सचाई से रूबरू करने का शुक्रिया, शायद ये ही वजह रही की भड़ास के धाकड़ भडासी ने अपनी अलग राह बना ली.
जस्टिस साहब का जंग जीत में तब्दील हो इसकी प्रार्थना और जज साब का साथी.
बधाई और शुभकामना

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