लो क सं घ र्ष !: अभिलाषा के आँचल में...


अभिलाषा के आँचल में ,
भंडार तृप्ति का भर दो।
मन-मीन नीर क ताल में,
पंकिल न हो यह वर दो॥

रतिधरा छितिज वर मिलना ,
आवश्यक सा लगता है।
या प्रलय प्रकम्पित संसृति,
स्वर सुना सुना लगता है ।

ज्वाला का शीतल होना,
है व्यर्थ आस चिंतन की।
शीतलता ज्वालमयी हो,
कटु आशा परिवर्तन की॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल "राही"

1 comment:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

सुन्दर है, मेरे जैसे ऊबड़-खाबड़ आदमी तक को इसमें रस आया.... साधु साधु
जय जय भड़ास

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