हम और शान्ति कदापि नही............

हम समस्याओं और समस्याएं हमारे बिना रह नही सकते, चोली दामन का रिश्ता है हमारा.....जिंदगी हर सुबह उम्मीदके साथ होकर चिंतन पर ख़त्म होती है और बीच मैं रह जाते हैं हम अपने, परिवार के, समाज के, राज्य के , देश केऔर अगर कुछ नही तो पुरे विश्व की समस्याओं के साथ।
विश्व अगर शांत है तो देश के पास उम्मीदें होती है, देश मैं सब ठीक है तो समाज कमोबेश संतुष्ट रहता है औरसमाज बिना हम और आपके तो बन ही नही सकता, यानि की हमारी शान्ति और खुशी पर विश्व कमोबेश निर्भरकरता है। जैसे जैसे हमारा देश आगे बढ़ा है या फ़िर बढ़ रहा है वैसे ही हमारी समस्याएं भी॥
राजनीतिक :-

२००८ मैं आम चुनाव की वजह थी "भारत-अमेरिका" परमाणु समझौता, ऐसा लगा की भारत की नई सामरिकनिति के खिलाफ बोलने वाले लोग अपनी मान्यताओं परडटे रहेंगे और सरकार (फलतः समाज) लंबे समय तकराजनितिक विरोधाभास के बीच चलेगी............समस्यागहरी थी, एक सरकार लगभग गिरा दी गई, नये आमचुनाव हुए और विरोध करने वाले भूल ही गए कि हमनें इसमुद्दे को उठाया भी था.... (एक समस्या ख़त्म) क्या ये इतनीज़ल्दी भुला दे जाने वाली बात थी? अगर हाँ तो इतना नाटक क्योँ किया ? क्योँ संसद मैं तीन दिन तक बहस चलतीरहीअगर नहीं तो कहाँ गए वो लोग जो भारत को अमेरिका के आगे किसी कीमत पर नीलाम नहीं होने देने वालेथे! सब नाटक लगता है, दुसरे शब्दों मैं "वो बात जो बिलकुल सीधी हो बिना किसी वजह के विवादास्पद बना दिया जाता है"।

ऐसे ही किसी ना किसी बात पर हरदम राजनैतिक अशांति को झेलते रहते हैं, चुपचाप बिना किसी विरोध के।

आर्थिक:-

सन १९९१ ई के बाद हिन्दुस्तान ने ज़बरदस्त तरक्की कि (कोई चाहे जो भी तर्क दे, सच तो है कि तरक्की हुई)। इतना कि हमारा शीत युद्ध के दिनों का सबसे बड़ा दुश्मन आज हमारा सबसे बड़ा हमकदम बन चूका है। गरीब देशों के श्रेणी मैं आने वाला भारत अचानक ही विकासशील देशों का नेतृत्व करने वाला बन गया। पूरी दुनिया मैं सब भारत आना चाहता है, बड़ी अजीब सा इत्तिफाक है कि भारतीय सिनेमा को देखकर हसने वाले हालीवुड के शीर्ष अभिनेता आज हिंदी फिल्मों मैं पेड़ों के पीछे नाचना चाहता है और इसमें उसे भारतीय कला दिखती है (१९९१ से पहले कभी नहीं दिखी) । कहने का मतलब है कि नयी आर्थिक निति से फायदा हुआ, परन्तु क्या शांति मिली? क्या सरकार निश्चिंत हो पायी कि अब यहाँ कोई भूखे पेट नहीं सोता है? क्या लोग अब व्यवस्था के खिलाफ नहीं बोलते? क्या खून खराबा, चोरी, लूट इन सब घटनाओं मैं कमी हुई? शायद ही किसी प्रश्न का जवाब हाँ मैं हो। सारी दुर्व्यवस्थाएं अपनी जगह पर है। गरीबी, अशिक्षा, जनसंख्या, सुरक्षा सारी समस्याए अपनी जगह ज्यौं कि त्यों है। दुसरे शब्दों मैं अगर सार निकाला जाय तो "शांति का समृधि से मतलब तो हो सकता है परन्तु एक हद तक ही" ....
हम उतने ही अशांत हैं जितने पहले थे, रोज़गार के नए रास्ते तो ज़रूर मिले हैं परन्तु बेरोजगारी अपने जगह पर ठाठ से कायम है (घर मैं अशांति) , छीनने और लूटमार यथावत है (समाज मैं अशांति),

अगले ब्लॉग मैं जारी........(क्रमशः)

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