गाँव से आए हुए महीने दिन से ज्यादा होने को आए मगर आज भी जैसे लगता है की कल ही आया हूँ, यादों की वो बारात पीछा छोरने का नाम ही नही ले रही है। बहरहाल चलिए अब मुद्दे पर आ जाऊं।
गाँव में होली आने वाली थी सो चहुँ और बसंती माहोल था दोपहर का समय हुआ था जब मैं नहाने को अपने खरिहान में चापाकल (हाथ से चलाने वाला पानी का नल) पर गया था कि तभी दूर गरीब मछुआरे की बस्ती से शोर सुनाई दिया, आदतन जैसा था वैसा ही भागा तो देखा कि एक झोंपडे में आग लगी हुई है और लोग उसे बुझाने की कोशिश में लगे हुए हैं। मैं भी उस हुजूम में शामिल हो गया मगर आग बुझाने के लिए पानी या रेत या फ़िर कुछ और लाऊँ कहाँ से अपने भाई को कहा कि जल्दी से घर जा और फायर बिग्रेड को फोन कर...... कह तो दिया मगर फ़िर अपने आप पर ही शर्म आयी।
बहरहाल साथी हाथ बढ़ाना की तर्ज पर लोगों ने आपसी सहयोग से आग पर काबू पाया अन्यथा उस झोपडे की बस्ती का समाप्त होना तय था। आग बुझने के बाद घर गया और मोबाइल से कुछ तस्वीरें ले आया जो ब्लॉग के माध्यम से लोगों से साझा करना था।
जली हुई झोंपडी बिखडा हुआ घर और पास में उपले का अम्बार यानी की आग का सारा उपयुक्त सामन।
नए घर बनाने कि शिकन चेहरे पर और संग ही बिहार विकास कि झलक भी !!!
जले हुए घर से अपने सामानों को तलाशती पीडिता।
जाने का वो रास्ता जहाँ से मदद आनी थी।
आग बुझी और गाँव को मिली राहत मगर ना बुझा तो मेरे दिल का आग.......
क्या ये नीतिश का विकाशशील बिहार है?
मौलिक आवश्यकता से कोसो दूर ग्रामीण बिहार और नीतिश के बिहार के विकाश के दावे में क्या तालमेल है?
ना ही पानी ना ही फायर बिग्रेड यहाँ तक कि गरीब को खाने के लाले और ना ही कोई सरकारी मदद और विकाश की ढोल क्या बिहारियों के साथ मजाक नही है?
प्रश्न करता है अनकही लोगों से, सरकार से और बिहार के कर्ता धर्ता से कि बिना ग्रामीण विकाश के हमारे विकाशशील होने कि बात कोई कैसे कर सकता है। क्या सरकार वाकई में लोगों में पहुँच बना रही है?
अनकही का यक्ष प्रश्न जारी है ?
15 comments:
समस्याओं को कहना कहना या फिर उनके दर्द को महसूस करना है; यह कितनी गहराई से और साफगोई से बयान किया जाए...यह लिखने की कला है. बहुत अच्छा.
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us remot area ki baat uthate hai jise aksar chhod diya jata hai...
Nitish doesnt deserve to be voted back...
Why not ? Does Rabri deserve it ?
काश .. जनता के हितैशी बनने वाले नेताओं को प्रभु सदबुद्धि और सम्वेदना दे..
prashna achche utha rahe ho magar koi sarthak jawab mila kya---------mushkil hai milna.
इतने सालों की बरबादी ठीक करने में बहुत समय लगेगा। नितीश कुमार जी के हाथ में कोई जादू की छड़ी तो नहीं है। वैसे हब तक हम जाति के आधार पर लोगों को चुनाव लड़वाएँगे और वोट भी उसी आधार पर देंगे हमें प्रश्न करने का अधिकार ही नहीं रह जाता।
घुघूती बासूती
भाई,
बढ़िया प्रश्न है आपका, विकास का सब्जबाग दिखाकर एक बार फिर से नेता लोगों को भूल भुलैया में छोरने वाले हैं, घुगुती जी से असहमत क्यूँकी नीतिश जी विकास का ही ढीढोडा पीत रहे हैं और अपने आप को वास्तविक विकास पुरुष भी कहते हैं मगर असलियत बयां करती ये तस्वीरें विकास का पोल खोल रही है.
प्रश्न उठाने के लिए साधुवाद.
दोस्त येहीच हाल सभी जगह का है चो तो दिल्ली के बगलगीर गांव में आकर देख लो, सरकार का विकास वास्तविक भारत को ना मिल रहा है और ना ही पहुँच रहा है, जूते का प्रकरण देखकर लगता है की अपना विकास करने वाली सरकार और लोगों के पैसे हड़प करने वाला तंत्र नि:संदेह जूते ही खाने लायक है.
देखिये आपको कौन कौन जवाब देता है ?
सत्य तो यही है। नेता प्रचार करते हैं, सुधार नहीं। अब समय है अपना मत सही उम्मीदवार को देकर अपना कर्तव्य निभाने का। अच्छी और सच्ची प्रस्तुति के लिए बधाई।
than who will deserve better in your opinion in the entire India
Who will deserveit ? Iits us ...till we fools get up and takeover this country its going to go the dogs....Shaid bhai.
अगलगी की ऐसी घटनाएँ ,गांवों के लिए बड़ी आम बात है.....बड़ी ही दुखद स्थिति है यह....
लेकिन आपने जो इसके बहाने प्रश्न उठाया है, उसका एक लाईना उत्तर या किसी एक व्यक्ति या संस्था जो जिम्मेदार ठहरा ,नहीं दिया जा सकता...
इसपर लम्बी बात की जा सकती है,पर संक्षेप में अभी यही कहूंगी कि बिहार को बहुत ही नजदीक से नीतिश पूर्व शाशनावस्था में भी देखा है और अब भी देख रही हूँ और इतना कहना पड़ेगा कि नीतिश जी ने इतने अल्प काल में जो किया है वह किसी जादू की छड़ी से कम नहीं....यदि बिहार की आम जनता जातीयता,भष्टाचार से अपने को उबार ले तो निश्चित ही विकास होगा और आज सी स्थिति नहीं रहेगी...
shahar jalne ka sabab yahi hai.log ek dusre se jalte hai.
ग्रामीणों को आगजनी की समस्या से अपने स्तर पर ही जुझना पडता है। दमकल कभी भी वक्त पर नहीं पहुंच पाती। जब पहुंचती हैं तब तक सब उजड चुका होता है। अब तो लगता है 108 की तर्ज़ पर कोई अग्निशामक सेवा भी शुरू हो जानी चाहिये।
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